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    30.11.18

    मनोविज्ञान-बाल विकास-- टॉपिक:- विकास की अवस्थाएँ और वृद्धि- विकास के सिद्धान्त


    दोस्तों आज हम मनोविज्ञान-बाल विकास के टॉपिक विकास की अवस्थाएँ और वृद्धि- विकास के सिद्धान्त पर चर्चा करेंगे.

    विकास की अवस्थाएँ

    हरलॉक के अनुसार-
    1- जन्म से पूर्व की अवस्था गर्भावस्था।
    2- जन्म से 14 दिन तक की अवस्था प्रारम्भिक शैशवावस्था
    3-  2 से 11 वर्ष की बाल्यावस्था
    4-  11 से 13 वर्ष वर्ष तक प्रारम्भिक किशोरावस्था
    5-  13 से 17 किशोरावस्था
    6-  5 से 21 उत्तर किशोरावस्था

    शैले ने विकास की तीन अवस्थाएं बताई है
    (1) शैशवावस्था (0-5 वर्ष तक)

    (2) बाल्यावस्था  (6-12 वर्ष तक)

    (3) किशोरावस्था  (13-18 वर्ष तक )

    रॉस के अनुसार वर्गीकरण
    (1) शैशवावस्था – 1 से 3 वर्ष तक
    (2) आरम्भिक बाल्यावस्था- 3 से 6 वर्ष तक
    (3) उत्तर बाल्यावस्था – 6 से 12 वर्ष तक
    (4) किशोरावस्था – 12 से 18 वर्ष तक

    कॉलसनिक के अनुसार विकास की अवस्थाएॅं-

     भ्रूणावस्था-जन्म से पहले की अवस्था
    नव शैशवावस्था-जन्म से 4 सप्ताह तक
     आरम्भिक अवस्था-5 माह से 15 माह तक
     उत्तर शैशवावस्था-15 माह से 30 माह तक
     पूर्व बाल्यावस्था -2 से 5 वर्ष तक
     मध्य बाल्यावस्था 6 से 9 वर्ष तक
     उत्तर बाल्यावस्था 9 से 12 वर्ष तक
    अर्नेस्ट जॉन्स के अनुसार वर्गीकरण

    इसका वर्गीकरण सर्वाधिक उपयुक्त और मानक है।
    शैशवावस्था 0.6 वर्ष तक 0 से 5.6 वर्ष तक।
     बाल्यावस्था 6 से 11.12 वर्ष तक।
     किशोरावस्था -12 वर्ष से 18 तक।
    शैशवावस्था

    मनुष्य को जो कुछ बनना होता है। वह 4-5 वर्ष में बन जाता है। बालक के निर्माण का काल शैशवावस्था है। फ्रायड सिंगमंड शैशवावस्था मानव विकास की 2 अवस्था है।

    शैशवावस्था की विशेषताऐं

    मूल प्रवृत्तियों पर आधारित व्यवहार करते है। भूख लगने पर किसी वस्तु को मुंह में डालना।
    नैतिकता का अभाव होता है। अनुकरण की प्रवृत्ति जिज्ञासा की प्रवृति।
    सामाजिक भावना का विकास 5.6 वर्ष के बीच सीखने की प्रक्रिया में तीव्रता आती है।

    कल्पना लोक में विचरण करता है।
    दोहराने की प्रवृत्ति।

    शैशवावस्था में शिक्षा का स्वरूप-
    1- चित्र और कहानियों के द्वारा शिक्षा
    2- खेल के द्वारा शिक्षा
    3- अच्छी आदतों का निर्माण
    4- मानसिक क्रियाओं का विस्तार
    5- आत्म निर्भरता का विकास
    6- जिज्ञासा की संतुष्टि
    7- क्रिया के द्वारा सीखना

    शैशवावस्था में मानसिक विकास
    प्रत्यय (विज्ञान)
    नोट :- शैशवावस्था में बालक में प्रत्यय निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। वह एक और अनेक में अंतर करना सीख जाता है। यह चिंतन करना सीख जाता है।
    इस अवस्था में बालक में निम्नलिखित विशेषताएॅं होती है-
    1- प्रत्यय का मतलब चिंतन
    2- बालक एक और अनेक में अंतर सीखना सीख जाता है।
    3- बालक प्रारम्भ में ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा सीखता है।
    4- मानसिक विकास का साधन ज्ञानेन्द्रियां हैं।
    5- बालक में स्पर्शता और ताप दबाव जन्म के समय में उपस्थित होती है।
    6- जिज्ञासा जन्मजात है।
    7- सूक्ष्म, चिंतन जन्मजात है।
    8- बालक ने जिज्ञासा और सूक्ष्म चिन्तन का प्रारम्भ शैशवावस्था में ही होती है।
    9- बालक में रटने की क्षमता होती है।
    10- स्मरण शक्ति विकसित हो जाती है।
    11- बालक में कल्पना शक्त्ति इसी शैशवावस्था में होता है।
    12- इस अवस्था में शिशु कल्पना जगत में विचरण करता है। उनकी रुचि कहानियॉं सुनने में अधिक होती है। इस अवस्था में सीखने की प्रक्रिया तीव्र होती है।

    शैशवावस्था में सामाजिकता का प्रभाव
    1- 3 माह में मां को पहचानना।
    2- 5 माह में क्रोध व प्रेम में अंतर समझने लगता।
    3- 6 माह में अपरिचितों को व परिचितों को पहचानने लगता है।
    4- 1 वर्ष की उम्र में मना किए जाने वाले कार्य नहीं करता है।
    5- 2 वर्ष की आयु में बड़ो के साथ कोई न कोई काम करने लगता है।
    6- परिवार का सक्रिय सदस्य बन जाता है।
    7- 3 वर्ष में अन्य बच्चों के साथ खेलना शुरू कर देता है और उनसे सामाजिक संबंध बनाने लगता है।
    8- उत्तेजना- जन्म के समय बालक मेंं केवल उत्तेजना होती है।
    (उत्तेजना एक संवेग है।)

    संवेग व्यक्ति की उत्तेजित दशा है-वुडवर्थ
    विशिष्ट संवेग-मनोवैज्ञानिकों के अनुसार 3 मुख्य संवेग है
    (1) प्रेम (2) भय (3) क्रोध और तीनों बच्चों में पाये जाते हैं।
    पलायन-अपने लक्ष्य से लौटना या वापिस आना। जन्म के बाद प्रेम और भय संवेग होते हैं।
    शिशु में आत्मसमान की प्रवृत्ति अधिक होती है। सामाजिक भावना का विकास 3 वर्ष की उम्र के बाद शुरू होता है।

    इस अवस्था में कुछ बालक एकांतप्रिय भी होते हैं।
    शिशु अधिकाधिक अनुकरण करके सीखता है।

    शैशवावस्था में भाषा का विकास
    नोट :- बालक (शिशु) केवल क्रन्दन करता है। उसे भाषा का ज्ञान नहीं होता है।
    स नोट :- जन्म से 8 माह तक बच्चे के पास भाषा के रूप में किसी प्रकार का शब्द कोष नहीं होता है। लेकिन 1 वर्ष के बाद उसके पास शब्द कोष का विस्तार होने लगता है।
    5 वर्ष की अवस्था तक बालक के पास लगभग 2500 शब्दों का शब्दकोष संग्रहित होता है।
    इस काल में बालक की मानसिक योग्यताओं का विकास शुरू हो जाता है।
    3 से 5 वर्ष की उम्र तक वह तुलना करना, निर्णय करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
    फ्रायड के अनुसार बालक में यौन भावना का विकास शैशवावस्था में शुरू हो जाता है। इस अवस्था में बालक में आत्म प्रेम की भावना होती है।
    मनोवैज्ञानिकों के अनुसार लड़का अपनी मॉं से और लड़की अपने पिता से अधिक प्रेम करते हैं। अगर लड़की अपने पिता से प्रेम करती है और मां से घृणा करती है तो उसे इलेक्ट्रा कॉम्पलेक्स कहते हैं। इसके विपरीत बालक अपनी माता से प्रेम करता है और पिता से घृणा करता है उसे ओडिपस कॉम्पलेक्स कहते हैं।

    बाल्यावस्था
    (6 से 12 वर्ष तक की अवस्था)
    बाल्यावस्था के उपनाम
    1- अनोखा काल
    2- छद्म परिपक्वता
    3- बहिमुखी व्यक्तित्व का काल
    बाल्यावस्था में बालक ने मानसिक योग्यताओं का विकास मुख्य विशेषता है। इसलिए इसे वैचारिक अवस्था का काल कहते हैं।

    बाल्यावस्था की विशेषताएं
    1- वास्तविक दुनिया से संबंध स्थापित होता है।
    2- संग्रह की प्रवृत्ति होती है।
    3- सामाजिकता का विकास (शैशवावस्था का विकास का प्रारम्भ)
    4- फालतू का घूमने की प्रवृत्ति होती है।
    5- समूह में घूमने की प्रवृत्ति होती है।
    6- बर्हिमुखी व्यक्तित्व का विकास होता है।
    7- सामूहिक रूप से खेलने की रूचि होती है।
    8- रूचियों में/अभिरूचियों में परिवर्तन होता है।
    9- रूचि जन्मजात नहीं होती है। रूचि परिवर्तनशील होती है।

    बाल्यावस्था में शिक्षा का स्वरूप
    1- 5.8 वर्ष तक उम्र में कहानी विधि द्वारा शिक्षा प्रदान की जाएं।
    2- जिज्ञासा की संतुष्टि करना।
    3- रचनात्मक कार्यों को करने के लिए प्रोत्साहित करना।
    4- सामाजिक गुणों का विकास
    5- खेल द्वारा शिक्षा
    6- शिक्षा की रोचक सामग्री

    बाल्यावस्था में मानसिक विकास
    बाल्यावस्था में मानसिक विकास के मापदण्ड
    1- संवेदना
    2- कल्पना
    3- निर्णय
    4- स्मरण शक्ति
    5- चिंतन
    6- संवेदना-किसी विषय के प्रति बच्चे की रूचि/अभिरूचि
    7- बुद्धि लब्धि
    8- भाषा का विकास
    9- 6 वर्ष तक की अवस्था में बच्चे को दायें-बायें का ज्ञान हो जाता है।
    10- 7 वर्ष की अवस्था में बालक को अंतर का ज्ञान हो जाता है।
    11- बाल्यावस्था/उत्तर बाल्यावस्था में बालक में बाह्य चिंतन विकसित होने लगता है।
    12- रचनात्मकता का विकास होता है।
    13- सूक्ष्म चिंतन शैशवावस्था में शुरू होता है।
    14- यह अवस्था शारीरिक और मानसिक दृष्टि से धीमी विकास की अवस्था है। इस अवस्था को मनोवैज्ञानिकों ने मिथ्या परिपक्वता का नाम दिया।

    सामाजिकता का विकास
    1- विधिवत रूप से सामाजिक जीवन में प्रवेश करता है।
    2- समूह की भावना विकसित होती है।
    3- 6 वर्ष इस अवस्था में लड़के-लड़कियां अलग-अलग खेलना पसंद करते हैं।


    वृद्धि एवं विकास के सिद्धान्त

     फेक – कोशिका की गुणात्मक वृद्धि अभिवृद्धि कहलाती है
    हरलाॅक-शारीरिक अंगों की लम्बाई भार में वृद्धि चैड़ाई में वृद्धि मस्तिष्क के आकार और संरचना में वृद्धि
    मुनरो-परिवर्तन श्रृंखला की वह अवस्था है जिसमें बालक भ्रूणा अवस्था से लेकर प्रौढ़ा अवस्था तक गुजरता है विकास कहलता है।
    गैसल:- विकास एक परिवर्तन है। जिसके द्वारा बालक में नवीन विषेशताएं नवीन गुणों और क्षमताओं का विकास होता हैं।
    जैम्स ड्रेवर-विकास प्राणाी में होने वाला प्रगतिशील परिवर्तन है जो किसी लक्ष्य की ओर निर्देषित होता है।
    हरलाॅक-दो बालकों में समान मानसिक योग्यता नहीं होती है।
    शर्मन-संवेदना ज्ञान की पहली सीढ़ी है नवजात शिशु में केवल दो संवेग होते हैं। सुख और दुख का है।
    वाॅटसन-भय क्रोध और स्नेह तीनों संवेगों का संबंध जन्म से होता है।
    अभिवृद्धि और विकास के सिद्धान्त/लक्षण
    निरन्तर विकास का सिद्धान्त :- विकास निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। बच्चों में ही व्यावहारिक पविर्तन से ही विकास का पता लगाया जा सकता है। प्रथम तीन वर्ष में बालक के विकास की प्र्रक्रिया तीव्र रहती है। उसके बाद धीमी हो जाती है।
    सामान्य से विशिष्ट की ओर– प्रारम्भ में बच्चा किसी वस्तु को पूरे हाथ से पकड़ता है उसके बाद अंगुलियों से इसे विकास की गामक विकास कहते है। बच्चों में सर्वप्रथम उत्तेजना का प्रारम्भ/अनुभव होता है। उत्तेजना सामान्य संवेग है जबकि अन्य विशिष्ट संवेग है।
    नोट :- बालक में भाषा विकास अर्थहीन आवाजों से होता है।

    मस्तष्का अधोमुखी सिद्धान्त- सिर से पांव की ओर विकास गर्भ में सर्वप्रथम सिर का विकास होता है फिर अन्य अंगों का विकास।
    निकट से दूर का सिद्धान्त– सिर का सर्वप्रथम विकास केन्द्रीय स्नायुमण्डल के पास से विकास शुरू होता है। उसके बाद क्रमशः हृदय छाती, कुहिनी, अंगुलियों का विकास फिर पैरों की ओर विकास होता है।
    संगठित प्रक्रिया का सिद्धान्त- एक जैसे  या एक ही क्षेत्र के विकास एक साथ जैसे-संवेगात्मक मानसिक, शारीरिक, सामाजिक विभिन्नताओं का सिद्धान्त- शैशवावस्था में विकास की गति तीव्र होती है। किशोरावस्था के अंग तक विकास की प्रक्रिया लगभग पूर्ण हो जाती है।
    नोटः- विकास वंशानुक्रम और वातावरण का परिणाम है।
    वृद्धि और विकास पर वंश और वातावरण का प्रभाव पड़ता है। सर्वप्रथम वंशानुक्रम का प्रभाव पड़ता है।
    समान प्रतिमान का सिद्धान्त- विश्व के किसी भी हिस्से में पशु मानव और सभी प्रजातियों में विकास का एक ही मानक होती है। सभी एक ही नियम या मानक का अनुसरण करते हैं-हरलॉक
    व्यक्तिगत भिन्नता का सिद्धान्त-एक ही आयु के दो बालकों दो बालिकाओं एक बालक/बालिका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक विकास में भिन्नता होती है अर्थात् प्रत्येक बालक का बालिका से अलग-अलग स्वरूप होता है।
    विकास क्रम का सिद्धान्त- तीन माह में एक बच्चा गले से आवाजें निकालना शुरू कर देता है। 6 माह आनंद देने वाली ध्वनियां निकालती है। 7 माह के बाद बच्चा दा मां के शब्दों का उच्चारण करना सीख जाता है।
    परस्पर संबंध का सिद्धान्त- बच्चें में शारीरिक, मानसिक, सामजिक, सांवेगिक विकास में परस्पर संबंध होता है। शारीरिक विकास के साथ बच्चे की रूचियों में संवेगांं में बदलाव आता है।

    शिक्षक भर्ती नोट्स

    General Knowledge

    General Studies