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    24.11.18

    Jean Piaget’s Theory of Cognitive Development: जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त


    संज्ञानात्मक विकास का अर्थ
    संज्ञानात्मक विकास का तात्पर्य संज्ञानात्मक योग्यताओं के विकास से है। संज्ञानात्मक योग्यता का अर्थ बुद्धि, चिंतन, कल्पना आदि से सम्बन्धित योग्यताएँ हैं। रेबर के अनुसार- ‘‘अधिकांश मनोवैज्ञानिकों के अनुसार संज्ञाान का तात्पर्य ऐसे मानसिक व्यवहारों से है, जिसका स्वरूप अमूर्त (Abstract) होता है और जिनमें प्रतीकीकरण (Symbolism), सूझ (Insight), प्रत्याशा (Expectancy), जटिल नियम उपयोग (complex Rule use), प्रतिमा (Imagery), विश्वास (Belief), अभिप्राय (Intentionality), समस्या समाधान (Problem Solving) तथा अन्य शामिल होते हैं।’’ संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के अन्तर्गत बच्चे का चिंतन, बुद्धि तथा भाषा में परिवर्तन आता है। इन तीनों परिवर्तनों में संवेदन, प्रत्यक्षीकरण, प्रतिमा-धारणा, धारणा, प्रत्याह्नान, समस्या-समाधन, चिन्तन, प्रक्रिया, तर्क-शक्ति जैसी महत्त्वपूर्ण प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। संज्ञानात्मक विकास प्रक्रियाएँ ही विकासमान बालक को कविताएँ याद करने, गणित की समस्या को हल करने के तरीके के बारे में सोचने व निर्णय लेने, कोई अच्छी व सृजनात्मक रणनीति बनाने व क्रमागत अर्थपूर्ण वाक्य बनाने जैसे कार्यों हेतु योग्य बनाती हैं। इस प्रकार संज्ञानात्मक विकास से तात्पर्य बालकों में संवेदी सूचनाओं को ग्रहण करके उस पर चिन्तन करने तथा क्रमिक रूप से उसे इस लायक बना देने से होता है, जिसका प्रयोग विभिन्न परिस्थितिओं  में करके वे तरह-तरह की समस्याओं का समाधन आसानी से कर सकते हैं।

    जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त
    संज्ञानात्मक विकास के सम्बन्ध में जीन पियाजे का योगदान सर्वोपरि है। जीन पियाजे (1896-1980) स्विट्जरलैण्ड के एक प्रमुख मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने प्राणि-विज्ञान में शिक्षा प्राप्त की थी, इनकी रुचि यह जानने की थी कि बालकों में बुद्धि का विकास किस ढंग से होता है। इसके लिए उन्होंने अपने स्वयं के बच्चों को अपनी खोज का विषय बनाया। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते गये, उनके मानसिक विकास सम्बन्धी क्रियाओं का वे बड़ी बारीकी से अध्ययन करते रहे। इस अध्ययन के परिणामस्वरूप उन्होंने जिन विचारों का प्रतिपादन किया उन्हें पियाजे के मानसिक या संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। जीन पियाजे ने 1923 से 1932 के बीच पाँच पुस्तकों को प्रकाशित कराया, जिनमें संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया। जीन पियाजे का मानना था कि बच्चे खेल प्रक्रिया के माध्यम से सक्रिय रूप से सीखते हैं, उन्होंने सुझाव दिया कि बच्चे को सीखने में मदद करने में वयस्क की भूमिका बच्चे के लिए उपयुक्त सामग्री प्रदान करना है। अल्फ्रेड बिने के साथ (1922-23) बुद्धि-परीक्षणों पर कार्य करते समय ही उन्होंने बालकों के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त की अवधारणा प्रस्तुत की। जीन पियाजे ने बालक के संज्ञानात्मक विकास के संदर्भ में शिक्षा मनोविज्ञान में क्रांतिकारी संकल्पना को प्रस्तुत किया है, जिसके परिणामस्वरूप इन्हें प्रतिष्ठित नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जीन पियाजे ने अधिगम के व्यवहारवादी सिद्धान्तों की आलोचना करते हुए संज्ञानात्मक विकास का गत्यात्मक माॅडल प्रस्तुत किया, जिसे ‘कन्स्ट्रटिविजम’ के नाम से जाना जाता है।

    जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की संकल्पाएँ-
    1. स्कीमा (Schema)

    2. आत्मसात्करण (Assimilation)

    3. समायोजन (Accommodation)

    4. साम्यधारण (Equilibrium)

    1. स्कीमा (Schema)- स्कीमा से तात्पर्य एक ऐसी मानसिक संरचना से है जो व्यक्ति विशेष के मस्तिष्क में सूचनाओं को संगठित तथा व्याख्या करने हेतु विद्यमान होती है। यह स्कीमा दो प्रकार की होती हैं- साधारण तथा जटिल। पियाजे के अनुसार स्कीमा को संशोधित व समायोजित करने में दो प्रक्रियाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है- आत्मसात्करण तथा समायोजन।

    I. आत्मसात्करण (Assimilation)- यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बालक समस्या के समाधान के लिए पूर्व सीखी गई      मानसिक प्रक्रियाओं का सहारा लेता है।

    II. समायोजन (Accommodation)- इस प्रक्रिया के अन्तर्गत बालक अपनी योजना, सम्प्रत्यय, व्यवहार आदि में परिवर्तन लाकर नये वातावरण के साथ अनुकूलन करता है।

    2. साम्यधारण (Equilibrium)- साम्यधारण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा बालक आत्मसात्करण तथा समायोजन की प्रक्रियाओं के बीच एक संतुलन कायम करता है। इस तरह से साम्यधारण एक तरह के आत्म-नियन्त्रक प्रक्रिया है।

    संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ
    जीन पियाजे ने बालकों के संज्ञानात्मक विकास की व्याख्या अपने सिद्धान्त को चार मुख्य अवस्थाओं में बाँटकर की है जो निम्नवत् हैं-

    1. संवेदी-पेशीय अवस्था (Sensori-motor Stage)

    2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational Stage)

    3. मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational Stage)

    4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage)

    जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ एवं विशेषताएँ

    1. संवेदी-पेशीय अवस्था (Sensori-motor Stage)- बच्चे के संज्ञानात्मक विकास की यह पहली अवस्था है। यह अवस्था बालक में जन्म से लेकर लगभग 2 वर्ष तक की अवधि में होती है। इस अवस्था में बालक अपनी इन्द्रियों के अनुभवों तथा उन पर पेशीय कार्य करके समझ विकसित करते हैं, (जैसे देखकर छूना, पैर मारना आदि)। इस अवस्था में बच्चा अपने आपको वस्तु से अलग करने की योग्यता प्राप्त कर लेता है।  इस अवस्था में शिशुओं का संज्ञानात्मक विकास प्रायः छः अवस्थाओं से होकर गुजरता है-

    I. प्रतिवर्त क्रियाओं की अवस्था

    II. मुख्य वृत्तीय प्रतिक्रियाओं की अवस्था

    III. गौण वृत्तीय प्रतिक्रियाओं की अवस्था

    IV. गौण स्कीमैटा के समन्वय की अवस्था

    V. तीसरी वृत्तीय प्रतिक्रियाओं की अवस्था

    VI. मानसिक संयोग द्वारा नवीन साधनों की खोज की अवस्था।

    2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational Stage)- संज्ञानात्मक विकास की यह दूसरी अवस्था है जो 02 से 07 वर्ष के मध्य की होती है। इस अवस्था में बच्चे की बोद्धिक योग्यता एवं चिन्तन-योग्यता में थोड़ी जटिलता आ जाती है। इस अवस्था को दो भागों में बाँटा गया है-

    I. पूर्व वैचारिक अवधि (Preconceptual Period)- यह अवधि 2 से 4 वर्ष के मध्य होती है। इस अवधि में बालक सूचकता (Signifiers) विकसित कर लेते हैं। सूचकता (Signifiers) से तात्पर्य इस बात से होता है कि बालक यह समझने लगते हैं कि वस्तु, शब्द, प्रतिमा तथा चिन्तन किसी चीज के लिए किया जाता है। जीन पियाजे ने इस अवस्था में संकेत (Symbol) तथा चिह्न (Sign) को चिन्तन का महत्त्वपूर्ण साधन माना है। इस अवस्था में बालक द्वारा किए जाने वाले कार्य (लाक्षणिक) मुख्यतः अनुकरण तथा खेल के माध्यम से किए जाते हैं।

    II. अन्तर्दर्शीय अवधि (Intuitive Period)- यह अवधि 4 से 7 वर्ष के मध्य की होती है। इस अवधि में बच्चे में प्रारंभिक तर्कशक्ति आ जाती है तथा इससे संबंधित विभिन्न प्रश्नों को जानना चाहता है। पियाजे ने इसे अन्तर्दर्शी अवस्था इसलिए कहा है क्योंकि बच्चा इस अवधि में अपने ज्ञान व समझ के बारे में पूर्णतया जानते हैं किन्तु वो कैसे जानते हैं और क्या जानते हैं इससे काफी हद तक अनभिज्ञ होते हैं। इस अवस्था में बालक का चिन्तन एवं तर्कणा पहले से अधिक परिपक्व हो जाती है। वह साधारण मानसिक क्रियाओं जैसे- जोड़, घटाव, गुणा व भाग आदि में सम्मिलित तो हो जाता है परन्तु इन मानसिक क्रियाओं के पीछे नियमों को समझ नहीं पाता है।

    3. मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational Stage)- पियाजे के सिद्धान्त के अनुसार संज्ञानात्मक विकास की यह तीसरी अवस्था लगभग 7 साल से प्रारंभ होकर 12 साल तक चलती है। यह द्वितीय अवस्था से अधिक विकसित संज्ञान की अवस्था है। इस अवस्था में बच्चों के विचारों में संक्रियात्मक क्षमता आ जाती है और अन्तर्दर्शी तर्कशक्ति की जगह तार्किकता (Logical Reasoning) आ जाती है फिर भी बालक समस्या समाधन हेतु मूर्त (स्थूल) परिस्थितियों पर ही निर्भर रहता है। 6 वर्ष की आयु में संख्या (Number), 7 वर्ष में मात्रा (Mass) तथा 9 वर्ष में वजन (Weight) के सम्प्रत्यय विकसित हो जाते हैं। इस अवस्था में सम्बन्ध-सम्प्रत्यय (Relational Concepts) भी विकसित हो जाते हैं। बच्चों में वस्तुओं को वर्गीकृत करने तथा उसके संबंधो को समझने की पर्याप्त क्षमता विकसित हो जाती है। इतना होने के बावजुद उनके चिंतन में पूर्ण क्रमबद्धता नहीं होती है। जीन पियाजे के अनुसार इस अवस्था के बालकों में जिन प्रमुख योग्यताओं का विकास होता है, उन्हें प्रायोगिक अध्ययनों द्वारा पाँच वर्गों में विभक्त किया गया है-

    I. संरक्षण (Conservation)

    II. संख्या बोध (Numeration)

    III. क्रमानुसार व्यवस्थापन (Seriation)

    IV. वर्गीकरण (Classification)

    V. पारस्परिक सम्बन्ध की क्षमता (Ability of Inter Relationships)

    इस अवस्था के दौरान बालक/बालिका को सिखाने-पढ़ाने के दौरान उन से सवाल पूंछने और चीजों या बातों को वापस आपको समझाने का मौका देने से उनमें मानसिक दृष्टि से उस जानकारी का इस्तेमाल करने में आसानी होती है। उपरोक्त आधार पर हम कह सकते हैं कि इस अवस्था में बालक की विचार प्रक्रिया छोटे बच्चों के बजाय बड़ों से अधिक मिलने लगती है।

    4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage)- संज्ञानात्मक विकास की यह अन्तिम अवस्था है जो 12 वर्ष से प्रारम्भ होकर 15 वर्ष तक चलती है। मूलरूप से यह अवस्था तार्किक चिन्तन की अवस्था है। अर्थात् इस अवस्था का बालक अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त स्वयं के विचार के सम्बन्ध में विचार करने में समर्थ हो जाता है। इस अवस्था में बालक में अमूर्त तथा वैज्ञानिक ढंग से सोचने की क्षमता विकसित हो जाती है अर्थात् उनका चिन्तन अधिक लचीला तथा प्रभावी हो जाता है, साथ ही चिन्तन में क्रमबद्धता स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती है। इस अवस्था में बालक परिकल्पित समस्याओं का भी सामना करने लगता है। धीरे-धीरे बालक में विवेक, रचनात्मक चिन्तन तथा पृथक्करण की योग्यताा निकल आती है। अभौतिक समस्याओं के समाधान की योग्यता भी आ जाती है। तार्किक चिन्तन की विकसित क्षमता, संज्ञानात्मक विकास की इस अवस्था के बालक एवं बालिकाओं में विभिन्न प्रकार की समस्याओं का समाधान खोजने में काफी सहायक होती हैं। औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

    I. तार्किक चिन्तन की योग्यता का विकास।

    II. परिकल्पना निर्माण की क्षमता का विकास।

    III. विसंगतियों के समझने की क्षमता का विकास।

    IV. विचारों के सम्बन्ध में विचार करने की योग्यता का विकास।

    V. समस्या समाधान की क्षमता का विकास।

    VI. विचारों को वर्गीकृत एवं संगठित करने की क्षमता का विकास।

    शिक्षक भर्ती नोट्स

    General Knowledge

    General Studies